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डॉ. सारंग पाटिल का सफ़र: प्राकृतिक चिकित्सा, योग, चिकित्सा और इंटीग्रेटिव स्वास्थ्य

डॉ. सारंग पाटिल अपनी मेज़ पर मेडिकल किताबों और लैपटॉप के साथ
टेक्स्ट:

डॉ. सारंग पाटिल का पेशेवर सफ़र औपचारिक शिक्षा, दशकों की क्लिनिकल प्रैक्टिस, शोध, शिक्षण और सेहत के अलग-अलग पहलुओं को एक साथ लाने की लगातार कोशिश से बना है। वे किसी एक विषय की लीक पर नहीं चले। उनका रास्ता कई जुड़े हुए क्षेत्रों में फैला है: प्राकृतिक चिकित्सा, योग, साइकोफ़िज़ियोलॉजी, क्लिनिकल प्रैक्टिस, अकादमिक शिक्षण, शोध और इंटीग्रेटिव मेडिसिन।

इसे योग्यताओं की सूची की तरह नहीं, एक ऐसे डॉक्टर के बनने की कहानी की तरह पढ़ना बेहतर है, जिसकी पेशेवर पहचान शिक्षा, अनुभव और स्वास्थ्य सेवा के व्यापक समुदाय के साथ लगातार जुड़ाव से बनी है।

प्राकृतिक चिकित्सा और योग विज्ञान से शुरुआत

डॉ. पाटिल ने 1994 में बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंसेज़ (B.N.Y.S.) पूरा किया, जो फ़ुल-टाइम रेज़िडेंशियल कोर्स था। इसके बाद उन्होंने मंगलोर विश्वविद्यालय के अंतर्गत एस.डी.एम. कॉलेज ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंसेज़, उजिरे में एक साल की इंटर्नशिप की। इस शुरुआती प्रशिक्षण ने प्राकृतिक चिकित्सा, योग, जीवनशैली पर केंद्रित सेहत और बचाव के तरीक़ों में उनके आगे के काम की नींव रखी।

पर यह सफ़र स्नातक की डिग्री पर नहीं रुका। बाद की पढ़ाई शरीर की प्रक्रियाओं, मन की अवस्थाओं और योग पर आधारित अभ्यासों के आपसी रिश्ते को समझने की ओर बढ़ती गई।

क्लिनिकल प्रशिक्षण से साइकोफ़िज़ियोलॉजी तक

जनवरी 2007 में डॉ. पाटिल ने स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान (sVYASA), बेंगलुरु से साइकोफ़िज़ियोलॉजी में PhD पूरी की। उनके शोध प्रबंध का शीर्षक था “A Comparison of Psychophysiological Effects of Two Yogic Meditation Techniques” (योग की दो ध्यान पद्धतियों के मनो-शारीरिक प्रभावों की तुलना)। इसके मार्गदर्शक डॉ. एच. आर. नागेंद्र और डॉ. शर्ली टेलेस थे।

साइकोफ़िज़ियोलॉजी ने उन दो क्षेत्रों के बीच एक अहम पुल बनाया जिन पर अक्सर अलग-अलग बात होती है: मन का अनुभव और शरीर की नापी जा सकने वाली प्रतिक्रियाएँ। यही धागा योग, रिलैक्सेशन, तनाव, साँस और इंटीग्रेटिव स्वास्थ्य पर उनके बाद के ज़्यादातर काम में दिखता है।

दशकों लंबा क्लिनिकल सफ़र

शिक्षा को असली मायने क्लिनिकल अनुभव से मिले। डॉ. पाटिल का क्लिनिकल करियर 1990 के दशक में शुरू हुआ और प्राकृतिक चिकित्सा अस्पतालों, योग-चिकित्सा केंद्रों, बहु-विशेषज्ञता वाले अस्पतालों और समग्र स्वास्थ्य के माहौल में चलता रहा है।

जनवरी 1996 से दिसंबर 2000 तक वे कोल्हापुर के प्राकृतिक चिकित्सा अस्पताल भारतीय निसर्गोपचार केंद्र में कंसल्टिंग योग और नेचुरोपैथिक फ़िज़िशियन रहे। दिसंबर 1997 से सितंबर 2002 तक कोल्हापुर के बहु-विशेषज्ञता अस्पताल लोटस हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में उन्होंने यही भूमिका निभाई, जहाँ प्राकृतिक चिकित्सा और योग पर आधारित क्लिनिकल प्रैक्टिस एक बड़े अस्पताल के माहौल के साथ चली।

सितंबर 2002 से मई 2005 तक वे स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान (sVYASA), बेंगलुरु से जुड़े योग-चिकित्सा केंद्र आरोग्यधाम में कंसल्टिंग योग और नेचुरोपैथिक फ़िज़िशियन रहे। इस दौर में उनकी क्लिनिकल प्रैक्टिस योग के शोध और अकादमिक काम के बहुत क़रीब रही।

सितंबर 2002 से वे कोल्हापुर में आनंदकुंज, शिवांबु नेचुरोपैथी एंड योग आश्रम में मेडिकल डायरेक्टर हैं, जिसे बचाव और इंटीग्रेटिव चिकित्सा का केंद्र बताया गया है। सितंबर 1995 से वे आम लोगों, मरीज़ों और स्कूली बच्चों के लिए योग-चिकित्सा की कक्षाएँ भी लेते आ रहे हैं। यह याद दिलाता है कि स्वास्थ्य शिक्षा का मतलब सिर्फ़ बीमारी आने के बाद इलाज करना नहीं है। उसका मतलब यह भी है कि लोग अपने शरीर को समझें और हरकत, साँस और जीवनशैली को रोज़ की भलाई का हिस्सा बनाएँ।

संपूर्ण स्वास्थ्य: पूरे सफ़र को एक जगह जोड़ना

सितंबर 2016 से डॉ. पाटिल संपूर्ण स्वास्थ्य होलिस्टिक हेल्थ रिट्रीट सेंटर के संस्थापक निदेशक हैं। यह पुणे के हैप्पी थॉट्स एट MaNaN आश्रम की एक पहल है।

संपूर्ण का मतलब है पूरा, और स्वास्थ्य का मतलब है सेहत। साथ मिलकर यह नाम इशारा करता है कि सेहत किसी पहचानी हुई बीमारी के न होने से कहीं बड़ी बात है। यह नज़रिया उनकी प्राकृतिक चिकित्सा और योग की शुरुआती शिक्षा को मन-शरीर चिकित्सा, जीवनशैली, बचाव की सेहत और इंटीग्रेटिव तरीक़ों में उनके बाद के काम से जोड़ता है।

क्लिनिकल काम के साथ अकादमिक सफ़र

सितंबर 2002 से डॉ. पाटिल sVYASA, बेंगलुरु के योग और बायोसाइंसेज़ विभाग में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैं। सितंबर 2024 से वे महाराष्ट्र आरोग्य विज्ञान विश्वविद्यालय (MUHS), नाशिक के अंतर्गत कोल्हापुर के कागल स्थित गवर्नमेंट नेचुरोपैथी कॉलेज एंड हॉस्पिटल के नेचुरोपैथी विभाग में मानद प्रोफ़ेसर भी हैं।

इससे पहले के अकादमिक पदों में गंगा एजुकेशनल सोसाइटी के इंस्टीट्यूट ऑफ़ योगा एंड नेचुरोपैथी में नेचुरोपैथी एंड योग विभाग के प्रमुख (जून 1996 से मई 1999), और गंगा आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज, कोल्हापुर के स्वस्थवृत्त और सामुदायिक चिकित्सा विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (जून 1996 से सितंबर 2002) शामिल हैं। यानी पढ़ाना उनके करियर का शुरू से चलता आया हिस्सा है, बाद में जुड़ी कोई अलग गतिविधि नहीं।

शोध: योग और मानव तंत्र के बारे में सवाल पूछना

सितंबर 2002 से मई 2005 तक डॉ. पाटिल sVYASA, बेंगलुरु के योग अनुसंधान विभाग में रिसर्च फ़ेलो रहे। वे KHOJ (सेंटर फ़ॉर रिसर्च इन प्रिवेंटिव एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन) के रिसर्च डायरेक्टर रहे हैं, और कोल्हापुर की पंजीकृत शोध संस्था शिवांबु हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट के सचिव भी।

उनके प्रकाशित शोध में योग पर आधारित रिलैक्सेशन अभ्यासों की शारीरिक और मनो-शारीरिक प्रतिक्रियाओं पर अध्ययन शामिल हैं। इनमें p300 में बदलाव, ऑक्सीजन की खपत और साँस, हार्ट रेट वैरिएबिलिटी, कार्यक्षमता, और योग पर आधारित रिलैक्सेशन तकनीकों के बाद चक्रीय ध्यान और ऊर्जा ख़र्च पर काम है। इनमें से कई डॉ. शर्ली टेलेस के साथ मिलकर लिखे गए।

लेखन और ज्ञान बाँटना

डॉ. पाटिल का काम लेखन के ज़रिए आम लोगों की शिक्षा तक भी पहुँचा है। योग और प्राकृतिक चिकित्सा पर उनके लेख अख़बारों और पत्रिकाओं में छपे हैं, और उन्होंने किताबें लिखी हैं, जिनमें जीवनाचा आधार नैसर्गिक आहार (प्राकृतिक आहार, मराठी और हिंदी में), पंचकोश चिकित्सा (योग, मराठी और हिंदी में) और अष्टांगिक चिकित्सा (योग, मराठी और हिंदी में) शामिल हैं। वे इंडियन जर्नल ऑफ़ योगा के समीक्षक, शिवांबु समाचार के कार्यकारी संपादक और जीवन जल के संपादक भी रहे हैं।

पेशेवर और सार्वजनिक संस्थाओं से जुड़ाव

डॉ. पाटिल 2009 से भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत पुणे स्थित राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान (NIN) की गवर्निंग बॉडी के सदस्य हैं। वे इंडियन नेचुरोपैथी एंड योग मेडिकल ग्रेजुएट्स एसोसिएशन (INYGMA) की राष्ट्रीय गवर्निंग काउंसिल के महासचिव भी रहे हैं। उन्होंने कोल्हापुर के सीपीआर अस्पताल के आयुर्वेद और पंचकर्म विभाग में मानद योग और प्राकृतिक चिकित्सा सलाहकार के रूप में भी काम किया है, और शोध पद्धति और योग व प्राकृतिक चिकित्सा की नई प्रगति पर होने वाले सेमिनारों और वर्कशॉप में फ़ैकल्टी के रूप में भी जुड़े रहे हैं।

उनकी सार्वजनिक भागीदारी में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में आमंत्रित मुख्य व्याख्यान शामिल हैं, जिनमें 1999 में जर्मनी के गेर्सफ़ेल्ड में हुआ यूरिन थेरेपी का दूसरा विश्व सम्मेलन भी है।

चिकित्सा, एक लगातार चलती ज़िम्मेदारी

चिकित्सा के करियर की एक ख़ास बात यह है कि सीखना कभी ख़त्म नहीं होता। नया प्रमाण पुराने तरीक़ों को चुनौती दे सकता है, और मरीज़ चिकित्सा, सामाजिक और निजी हालात के और भी उलझे मेल के साथ आते हैं। इसलिए डॉक्टर की ज़िम्मेदारी है कि वह जिज्ञासु, जानकार, सोच-विचार करने वाला और सीखने के लिए तैयार रहे। डिग्रियों, पदों और प्रकाशनों के रिकॉर्ड से आगे, यही उसूल डॉ. पाटिल के पेशेवर विकास में हमेशा साथ रहा है।

इस सफ़र में “इंटीग्रेटिव” का मतलब

इंटीग्रेटिव स्वास्थ्य का मतलब आधुनिक चिकित्सा और पारंपरिक या पूरक तरीक़ों में से किसी एक को चुनना नहीं है। ज़िम्मेदार इंटीग्रेटिव नज़रिया पहले व्यक्ति की सेहत की चिंता को समझता है और तय करता है कि किस तरह की मेडिकल जाँच या इलाज ठीक रहेगा। उसके साथ पोषण, शारीरिक गतिविधि, नींद, तनाव प्रबंधन, योग, साँस के अभ्यास और जीवनशैली के दूसरे पहलुओं पर सोचने के मौक़े भी हो सकते हैं। पारंपरिक पद्धतियाँ भी किसी व्यक्ति के लिए काम के नज़रिए दे सकती हैं, बशर्ते उन्हें सोच-समझकर अपनाया जाए और वे ज़रूरी चिकित्सा देखभाल की जगह न लें।

इंटीग्रेटिव, लाइफस्टाइल और फ़ंक्शनल मेडिसिन में आगे का प्रशिक्षण

प्राकृतिक चिकित्सा और योग की नींव के साथ डॉ. पाटिल इंटीग्रेटिव और लाइफस्टाइल मेडिसिन में प्रशिक्षण लेते रहे हैं। उनके प्रमाणपत्रों में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन इंटीग्रेटिव मेडिसिन (PGDIM, 2007) और डिप्लोमा इन लाइफस्टाइल मेडिसिन (IBLM, 2008) हैं। इसके बाद उन्होंने लगातार CME कोर्स किए: तनाव की प्रक्रियाएँ और बायोमार्कर (2009), योग और उसके चिकित्सीय उपयोग (2010), आयुर्वेद और पंचकर्म (2011), फ़ंक्शनल न्यूट्रिशन (2022 और 2024), ओज़ोन थेरेपी (2022), कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी में एग्ज़ीक्यूटिव डिप्लोमा (2023) और IV थेरेपी (2025)। पूरी सूची डॉ. सारंग पाटिल का परिचय पेज पर है।

आगे की राह

डॉ. सारंग पाटिल के पेशेवर विकास की कहानी ऊपर दर्ज योग्यताओं और पदों पर ख़त्म नहीं होती। वे उनके करियर का तथ्यों वाला ढाँचा देते हैं। ज़्यादा अहम सवाल यह है कि वह शिक्षा और अनुभव उनके काम, मरीज़ों के प्रति उनके नज़रिए, साथियों और विद्यार्थियों से उनके जुड़ाव और स्वास्थ्य सेवा में उनके योगदान को आगे भी कैसे दिशा देते हैं।

उनका पेशेवर सफ़र आज भी आगे बढ़ रहा है। इसे वही सिद्धांत दिशा देते हैं जो मेडिकल विद्यार्थी से प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर बनने तक उनके साथ रहे: सीखना, ज़िम्मेदारी, सेवा और लगातार बेहतर होते जाना।

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