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PCOS: सिर्फ़ हॉर्मोनल नहीं, यह मेटाबॉलिक बीमारी है

घर में योगा मैट पर हल्के डंबल के साथ हल्की स्ट्रेंथ एक्सरसाइज़ करती एक युवा महिला
टेक्स्ट:

PCOD और PCOS को अक्सर एक माना जाता है, लेकिन दोनों एक नहीं हैं। PCOD अल्ट्रासाउंड में अंडाशय में कई फ़ॉलिकल्स दिखने की बात है। PCOS एक सिंड्रोम है जिसके लिए तीन में से दो मापदंड चाहिए: अनियमित या बंद माहवारी, ज़्यादा मेल हॉर्मोन (या उनके लक्षण — मुंहासे, चेहरे पर बाल), और अल्ट्रासाउंड में पॉलीसिस्टिक ओवरीज़। बहुत सी महिलाओं को अल्ट्रासाउंड में दिखता है लेकिन सिंड्रोम नहीं होता। लेकिन सिंड्रोम वाली कई महिलाओं की जाँच और इलाज पूरे नहीं होते।

भारत में रिप्रोडक्टिव उम्र की लगभग 15–20% महिलाओं को PCOS है — दुनिया में सबसे ज़्यादा। यह महिलाओं में सबसे आम हॉर्मोनल बीमारी है, अनियमित माहवारी का सबसे आम कारण, और बाँझपन के प्रमुख कारणों में से एक। फिर भी सबसे ज़रूरी बात मरीज़ों को अक्सर नहीं बताई जाती: PCOS मुख्यतः गायनेकोलॉजिकल नहीं, मेटाबॉलिक बीमारी है। इसके केंद्र में है इन्सुलिन रेसिस्टेंस — और उस पर काम करना PCOS को सँभालने का अहम हिस्सा है।

इन्सुलिन रेसिस्टेंस क्यों है असली मुद्दा

PCOS में ज़्यादा इन्सुलिन अंडाशय को ज़्यादा एंड्रोजन (टेस्टोस्टेरोन जैसे हॉर्मोन) बनाने के लिए उकसाता है। ज़्यादा एंड्रोजन फ़ॉलिकल के विकास में रुकावट डालते हैं — अंडा नहीं बनता, माहवारी अनियमित या बंद हो जाती है। जो फ़ॉलिकल्स ओव्युलेट नहीं होते, वे अंडाशय में जमा होते हैं — यही अल्ट्रासाउंड में पॉलीसिस्टिक दिखता है।

PCOS में इन्सुलिन रेसिस्टेंस अक्सर सामान्य फ़ास्टिंग ग्लूकोज़ टेस्ट से नहीं पकड़ी जाती। HOMA-IR (फ़ास्टिंग इन्सुलिन और ग्लूकोज़ से) और ग्लूकोज़ चैलेंज में इन्सुलिन का जवाब ज़्यादा संवेदनशील जाँच है। कई PCOS महिलाओं का फ़ास्टिंग ब्लड शुगर सामान्य होता है, लेकिन इन्सुलिन काफ़ी ज़्यादा — जो इन्सुलिन रेसिस्टेंस बताता है, और जो आम जाँच में नहीं दिखता।

यही कारण है कि PCOS को सँभालने के मुख्य तरीके इन्सुलिन रेसिस्टेंस पर काम करते हैं: खाने में बदलाव (ख़ासकर रिफाइंड कार्ब्स कम करना), कसरत, और मेटफ़ॉर्मिन (Metformin)। और यही कारण है कि PCOS के लक्षण वज़न बढ़ने से बिगड़ते हैं और थोड़े वज़न कम होने से भी अक्सर सुधरते हैं।

खाने में बदलाव का असर

PCOS में सबसे प्रमाणित डायटरी बदलाव है ग्लाइसेमिक लोड कम करना — यानी खाने से ब्लड ग्लूकोज़ (और इसलिए इन्सुलिन) कितनी तेज़ी से और कितना बढ़ता है। इसका मतलब है रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम करना: मैदा, ज़्यादा सफ़ेद चावल, चीनी, मीठे पेय, पैकेट नाश्ते। फ़ाइबर युक्त कॉम्प्लेक्स कार्ब्स (साबुत अनाज, दाल, सब्ज़ियाँ) उतनी ही मात्रा में इन्सुलिन बहुत कम बढ़ाते हैं।

लो ग्लाइसेमिक डाइट पर रैंडमाइज़्ड ट्रायल में फ़ास्टिंग इन्सुलिन, टेस्टोस्टेरोन, और माहवारी की अनियमितता — तीनों में सुधार दिखा। ट्रायल में असर साफ़ दिखा। नतीजे हर इंसान में अलग होते हैं, इसलिए डॉक्टर या डायटीशियन के साथ चलना बेहतर है।

प्रोटीन भी ज़रूरी है। हर खाने में पर्याप्त प्रोटीन ब्लड शुगर की बढ़त धीमी करता है। शाकाहारी मरीज़ों के लिए: हर खाने में दाल, पनीर, दही, या फलियाँ ज़रूर हों — सिर्फ़ रात को नहीं।

इनोसिटॉल (Inositol) (विशेषतः मायो-इनोसिटॉल (Inositol)) का ज़िक्र ज़रूरी है। यह साबुत अनाज और दालों में पाया जाता है। मायो-इनोसिटॉल (Inositol) सप्लीमेंट (2–4 ग्राम रोज़) पर PCOS में अच्छे प्रमाण हैं: इन्सुलिन सेंसिटिविटी सुधरती है, टेस्टोस्टेरोन घटता है, माहवारी नियमित होती है, और गर्भ चाहने वाली महिलाओं में अंडे की गुणवत्ता बेहतर होती है। मैं इसे PCOS में सबसे प्रमाणित सप्लीमेंट में मानता हूँ।

कसरत — सिर्फ़ वज़न नहीं, हॉर्मोन भी बदलती है

PCOS में कसरत वज़न घटाए बिना भी इन्सुलिन सेंसिटिविटी सुधारती है। एरोबिक और रेसिस्टेंस ट्रेनिंग दोनों का प्रमाण है, लेकिन रेसिस्टेंस ट्रेनिंग का फ़ायदा ज़्यादा टिकाऊ हो सकता है — मसल बनाने से ग्लूकोज़ अपटेक ज़्यादा होती है। दोनों मिलाकर सबसे अच्छे मेटाबॉलिक नतीजे देते हैं।

न्यूनतम: हफ़्ते में 150 मिनट मॉडरेट एरोबिक, या दो रेसिस्टेंस ट्रेनिंग सेशन के साथ। नियमित कसरत से कई महिलाओं में माहवारी ज़्यादा नियमित हो सकती है।

वज़न — 5% भी काफ़ी है

अतिरिक्त वज़न वाली PCOS महिलाओं में सिर्फ़ 5% वज़न घटाने से इन्सुलिन सेंसिटिविटी सुधर सकती है, एंड्रोजन कम हो सकते हैं, और कई महिलाओं में माहवारी नियमित हो सकती है। 70 किलो की महिला में यह 3.5 किलो है। क्रैश डाइट नहीं, बल्कि प्रोटीन के साथ मॉडरेट कैलोरी कम करना और रेसिस्टेंस ट्रेनिंग — ताकि वसा जाए, मसल रहे।

हाथ में पानी की बोतल लिए पार्क में टहलती महिला, चारों ओर संतुलित थाली, योग और नींद के चिह्न

तनाव और PCOS

लगातार तनाव PCOS दो तरफ से बिगाड़ता है। कॉर्टिसॉल सीधे इन्सुलिन रेसिस्टेंस बढ़ाता है। और तनाव में एड्रिनल ग्रंथि से अतिरिक्त एंड्रोजन बनते हैं। इसीलिए परीक्षा, ऑफिस का प्रेशर, या घर का तनाव PCOS के लक्षण भड़काते हैं — और तनाव प्रबंधन सिर्फ़ वैकल्पिक नहीं, देखभाल का ज़रूरी हिस्सा है।

दवाई कब फ़ायदेमंद है

मेटफ़ॉर्मिन (Metformin) इन्सुलिन सेंसिटिविटी सुधारती और एंड्रोजन प्रोडक्शन घटाती है। यह कन्फ़र्म्ड इन्सुलिन रेसिस्टेंस या जीवनशैली बदलाव से कम सुधार वाली ज़्यादातर PCOS महिलाओं के लिए सही पहली दवाई है। ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स (OCP) माहवारी नियमित करते और एंड्रोजन के लक्षण (मुंहासे, बाल) कम करते हैं — लेकिन इन्सुलिन रेसिस्टेंस को नहीं छूते। बंद करने पर सब लक्षण वापस आ सकते हैं, कभी-कभी पहले से ज़्यादा।

गर्भ चाहने वाली PCOS महिलाओं में इनोसिटॉल (Inositol) + मेटफ़ॉर्मिन (Metformin) + जीवनशैली बदलाव से अक्सर ओव्युलेशन होने लगती है। अगर नहीं, तो लेट्रोज़ोल या क्लोमीफ़ेन से ओव्युलेशन इंडक्शन उचित सफलता दर के साथ काम करती है।

आगे की तस्वीर

PCOS सिर्फ़ रिप्रोडक्टिव उम्र की बात नहीं। PCOS वाली महिलाओं में टाइप 2 डायबिटीज़ का जोखिम कई गुना ज़्यादा होता है, दिल की बीमारी और एंडोमेट्रियल कैंसर का भी। तीसवें साल से हर साल फ़ास्टिंग ग्लूकोज़, लिपिड पैनल, और ब्लड प्रेशर देखना ज़रूरी है — यह बातचीत गायनेकोलॉजी अपॉइंटमेंट में अक्सर नहीं होती।

PCOS को डायग्नोसिस के समय से मेटाबॉलिक बीमारी की तरह लेना — सिर्फ़ गर्भ चाहने पर नहीं, सिर्फ़ बहुत अनियमित माहवारी होने पर नहीं — यही अप्रोच अभी जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाती है और आगे की बीमारी कम करती है।

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